आद्य शक्ति दुर्गा के तीन रूप और नौ स्वरूप

                        

                           आद्य भगवती शिवा

               महाकाली              महालक्ष्मी              महासरस्वती 

सृष्ट्वाSखिल जगदिदं सदसत्स्वरूपम्,

क्त्या स्वया त्रिगुणया परिपातिविश्वम्।

संहृत्य कल्प समये रमते तथैका,

तां सर्व-विश्व जननीं मनसा स्मरामि।।

(देवी भागवत१/२/५)

भावार्थ-: जिन भगवती से सृष्टि हुई है सहारा अखिल जगत उत्पन्न हुआ है, जो सद- सत् स्वरूपा है स्वयं जो त्रिगुणात्मिका( ब्रह्माणी; कमलानी ; रुद्राणी) (अथवा महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती) शक्ति हैं जो इस विश्व की रक्षा करने में तत्पर हैं कल्प के अंत में जो सब कुछ विनाश करके फिर उसी विश्व की पुनः रचना कर उस में रमने वाली एक मात्र जो हैं- उन भगवती की जो सब की जननी हैं उनका मन से ध्यान करता हूँ ।


अर्धनारीश्वर  में स्थित शिवा आदि भवानी दुर्गा के तीन स्वरूप

1 ✡ (शिव जी की शक्ति) महाकाली 

2 ✴(विष्णु जी की शक्ति) महालक्ष्मी

1 💥(ब्रह्मा जी की शक्ति) महासरस्वती 

नमो देवि महामाये सृष्टिसंहारकारिणि।
अनादिनिधने चण्डि भुक्ति-मुक्ति-प्रदे शिवे।।

सकल भुवन मेतत् कर्तु कामा यदा त्वं
सृजसि जननि देवान् विष्णु रुद्राज-मुख्यान्।
स्थितिलय-जननं तै: कार-यस्येक-रूपा 
न खलु तव कथं चिद् देवि संसार-लेश:।।

भवानीं केचना चार्या: प्रवदंत्य-खिलार्थदाम्। 
आदि-मायां महाशक्तिं प्रकृतिं पुरुषानुगाम्।।
ब्रह्मैक-तासमापन्नां सृष्टि-स्थिति-अन्तकारिणीं
मातरं सर्व भूतानां  देवतानां तथैव च।।
(देवी भागवत पुराण)

महाकाली के तीन स्वरूप
1शैलपुत्री
2 स्कन्द माता
3 महागौरी

महालक्ष्मी के तीन स्वरूप
1 चन्द्र घण्टा
2 कात्यायनी
3 सिद्धदात्री

💥महासरस्वती के तीन स्वरूप
1 ब्रह्मचारिणी
2 कूष्माण्डा
3 कालरात्रि

नवदुर्गाया: जपनीयानि नव मन्त्राणि

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघण्टायै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कन्दमाताशिवायै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायन्यै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्यै नम:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नम:



माहेश्वरी वृषारूढा, त्रिशूल-वर-धारिणी।
महाहि-वलया-प्राप्ता, चन्द्ररेखा-विभूषणा।।


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{१}🏵'शैलपुत्री'🏵 के नाम से लोक विख्यात हैं।
ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम(पहली) दुर्गा हैं। मैना जी एवं पर्वतराज हिमालय जी की सुता(पुत्री) के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा गया है। नवरात्रि के अवसर पर  पूजन में पहले इन्हीं भगवती शैलपुत्री की पूजा और उपासना की जाती है।
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शैलपुत्री : मां दुर्गा का पहला रूप देवी शैलपुत्री का पूजन है
नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। आइए जानते हैं प्रथम देवी शैलपुत्री जी के बारे में :-

मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। हिमालय के वहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण हुआ शैलपुत्री। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। उनकी एक मार्मिक क्था है।

एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है।

सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब  घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया।

इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं।
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

🙏
आचार्य पं. सतीश कुमार शास्त्री
9555869444



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