आंवला नवमी

 *आंवला नवमी*


अक्षय नवमी(श्रीपरशुराम नवमी) सनातन धर्म में एक महत्वपूर्ण त्यौहार की तिथि में से एक है। अक्षय नवमी  कार्तिक के महीने में देव उठानी एकादशी के दो दिन पूर्व आती है। यह दिन कार्तिक  के शुल्क पक्ष की नवमी के दिन मनाया जाने वाला एक पूजा प्रकल्प है है। 

ज्यौतिषाचार्य पंडित सतीश कुमार शास्त्री 9555869444

अक्षय नवमी को  भगवान विष्णु के अवतार भगवान् परशुराम जी पूजा  की जाती है। 

आंवला नवमी की पूजा उत्तर भारत में अधिकता से की जाती है। इस दिन, आंवले के पेड़ के नीचे भोजन पकाया जाता है तथा परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर उस भोजन को ग्रहण करते हैं। महिलायें इस पूजा का पालन सन्तान की सुख पाने  तथा उन्हें अच्छे स्वास्थ्य आदि के लिये  करती हैं।


इस नवमी को  अन्य कई नामों जैसे अक्षय नवमी, अनला नवमी, आंला नवमी

अक्षय नवमी श्रीपरशुराम नवमी आदि से जाना जाता है

आंवला नवमी के दिन मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा बहुत शुभ मानी जाती है। देश के कोने-कोने से सनातन भक्त इस दिन अधिकतम धर्मलाभ अर्जित करने के लिए एकत्र होते हैं।

इस दिन भगवान परशुराम जी की ऑंवलों को चढ़ा करके पूजा होती है।

इस दिन की पूजा से भगवान परशुराम जी के दर्शन करके आंवला चढ़ाने से अक्षय सुख प्रदान करते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन-गोकुल की गलियों को छोड़कर मथुरा प्रस्थान किया था। यह वह दिन था जब भगवान श्रीकृष्ण ने लीलाओं को त्याग कर कत्र्तव्य के पथ पर कदम रखा था।


संदर्भ में एक कहानी है कि..

एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करने आईं। रास्ते में उन्होंने भगवान विष्णु और शिव की एक साथ पूजा करने की कामना की। लक्ष्मी माँ ने माना कि विष्णु और शिव को एक साथ कैसे पूजा जा सकता है। तब उन्होंने महसूस किया कि तुलसी और बेल की गुणवत्ता एक साथ आंवले के पेड़ में ही पाई जाती है। तुलसी को भगवान विष्णु से प्रेम है और भगवान शिव को बेल पत्र से।


माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर आंवले के पेड़ की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के पेड़ के नीचे भोजन तैयार किया और उसे श्री विष्णु और भगवान शिव को परोसा। इसके बाद उन्होने उसी भोजन को प्रसाद रूप मे स्वयं ग्रहण किया। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि थी। अतः यह परंपरा उस समय से चली आ रही है।


सत्य युगादि

ऐसा माना जाता है कि अक्षय नवमी के दिन सत्ययुग के शुरूआता हुई थी। इसलिए अक्षय नवमी को ‘सत्य युगादि के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन सभी प्रकार के दान-पुण्य गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। जैसा कि अक्षय नाम से पता चलता है, इस दिन कोई भी धर्मार्थ या भक्तिपूर्ण कार्य करने का फल कभी कम नहीं होता और न केवल इस जन्म में बल्कि अगले जन्म में भी व्यक्ति को लाभ होता है।


आंवला नवमी

अक्षय नवमी को देश के विभिन्न हिस्सों में ‘आंवला नवमी’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन, आंवला के पेड़ की पूजा की जाती है क्योंकि इसे सभी देवी-देवताओं का निवास माना जाता है। भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल में, इस दिन को ‘जगधात्री पूजा’ के रूप में मनाया जाता है, जिसमें सट्टा की देवी ‘जगधात्री’ की पूरी भक्ति के साथ पूजा की जाती है।


कूष्मांडा नवमी

अक्षय नवमी को ‘कूष्मांडा नवमी’ के रूप में भी मनाया जाता है क्योंकि हिंदू किंवदंतियों के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु ने ‘कूष्मांडा’ नामक राक्षस को परास्त किया और अधर्म के प्रसार में बाधा डाली।


कैसे करें आँवला नवमी की पूजा

प्रातः स्नान करके शुद्ध आत्मा से आँवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में बैठकर पूजन करना चाहिए। पूजन के बाद उसकी जड़ में जल या कच्चा दूध देना चाहिए। इसके बाद वृक्ष के चारों ओर कच्चा धागा बाँधना चाहिए। कपूर बाती या शुद्ध घी की बाती से आरती करते हुए सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद पेड़ के नीचे ब्राह्मण को भोजन कराकर दान दक्षिणा देनी चाहिए।


आँवला का आध्यात्मिक आलिंगन

आंवले का पेड़ हिंदू पौराणिक कथाओं और परंपराओं में एक विशेष स्थान रखता है। इसे पवित्र माना जाता है, यह भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी जैसी दिव्य रूप से जुड़ा है, जो दीर्घायु, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है। यह पूजनीय वृक्ष पवित्रता और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है।


अनुष्ठान और अनुष्ठान

भक्त विभिन्न अनुष्ठानों और प्रथाओं के साथ आंवला नवमी मनाते हैं। मंदिर प्रार्थना और भक्ति के जीवंत केंद्र बन जाते हैं, जहां भक्त स्वास्थ्य, धन और समृद्धि के लिए आशीर्वाद मांगते हुए भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा करते हैं।


आँवला फल का महत्व

आंवला फल स्वयं अपने औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है। विटामिन सी और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर, यह न केवल एक धार्मिक प्रतीक है बल्कि आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी एक महत्वपूर्ण घटक है। कुछ लोग इस दिन आंवले के फल का सेवन करते हैं, उनका मानना है कि इससे आशीर्वाद और शुभता मिलती है।


प्रकृति के प्रति आभार

आंवला नवमी सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है; यह प्रकृति के उपहारों का उत्सव भी है। यह मानव जाति और पर्यावरण के बीच सामंजस्य की याद दिलाता है, पेड़ों की पवित्रता और हमारे जीवन में उनकी अमूल्य भूमिका पर जोर देता है।


सांस्कृतिक महत्व

यह त्यौहार प्रार्थनाओं और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है; यह सांस्कृतिक गतिविधियों का अवसर है, जिसमें समुदाय जश्न मनाने के लिए एक साथ आते हैं। लोकगीत, संगीत और नृत्य प्रदर्शन अक्सर उत्सव को चिह्नित करते हैं, जिससे इस अवसर में जीवंतता और खुशी जुड़ जाती है।


खुशहाली का प्रतीक

आंवला नवमी समग्र कल्याण का सार समाहित करती है। यह आध्यात्मिक कल्याण, शारीरिक स्वास्थ्य और प्रकृति और मानव जाति के बीच सद्भाव का प्रतीक है। आंवले के पेड़ के प्रति दिखाई गई श्रद्धा गहरी जड़ें जमा चुकी सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती है जो प्रकृति और उसकी प्रचुरता का सम्मान करती हैं।


आँवला नवमी कथा

काशी नगरी में एक निःसन्तान धर्मात्मा तथा दानी व्यापारी रहता था। एक दिन व्यापारी की पत्नी से एक पड़ोसन बोली यदि तुम किसी पराये लड़के की बलि भैरव के नाम से चढ़ा दो तो तुम्हें पुत्र प्राप्त हो सकता है।


यह बात जब व्यापारी को पता चली तो उसने अस्वीकार कर दिया। परन्तु उसकी पत्नी मौके की तलाश में लगी रही।


एक दिन एक कन्या को उसने कुएँ में गिराकर भैरों देवता के नाम पर बलि दे दी। इस हत्या का परिणाम विपरीत हुआ। लाभ की जगह उसके बदन में कोढ़ हो गया। लड़की की प्रेतात्मा उसे सताने लगी।


व्यापारी के पूछने पर उसकी पत्नी ने सारी बात बता दी। इस पर व्यापारी कहने लगा गौवध, ब्राह्मणवध तथा बालवध करने वाले के लिए इस संसार में कहीं जगह नहीं है। इसलिए तू गंगातट पर जाकर भगवान का भजन कर तथा गंगा में स्नान कर तभी तू इस कष्ट से छुटकारा पा सकती है।


व्यापारी की पत्नी गंगा किनारे रहने लगी। कुछ दिन बाद गंगा माता वृद्धा का  वेष धारण कर उसके पास आयी और बोली तू मथुरा जाकर कार्तिक मास की नवमी का व्रत तथा आँवला वृक्ष की परिक्रमा कर तथा उसका पूजन कर। यह व्रत करने से तेरा यह कोढ़ दूर हो जायेगा।


वृद्धा की बात मानकर वह, व्यापारी से आज्ञा लेकर मथुरा जाकर विधिपूर्वक आँवला का व्रत करने लगी। ऐसा करने से वह भगवान की कृपा से दिव्य शरीर वाली हो गई तथा उसे पुत्र की प्राप्ति भी हुई।


आँवला नवमी दूसरी कथा

एक सेठ आंवला नवमी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराया करता था और उन्हें सोने का दान दिया करता था। उसके पुत्रों को यह सब देखकर अच्छा नहीं लगता था और वे पिता से लड़ते-झगड़ते थे। घर की रोज-रोज की कलह से तंग आकर सेठ घर छोड़कर दूसरे गांव में रहने चला गया। उसने वहां जीवनयापन के लिए एक दुकान लगा ली। उसने दुकान के आगे आंवले का एक पेड़ लगाया। उसकी दुकान खूब चलने लगी। वह यहां भी आंवला नवमी का व्रत-पूजा करने लगा तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देने लगा। उधर, उसके पुत्रों की व्यापार ठप हो गया। उनकी समझ में यह बात आ गई कि हम पिताश्री के भाग्य से ही खाते थे। बेटे अपने पिता के पास गए और अपनी गलती की माफी मांगने लगे। पिता की आज्ञानुसार वे भी आंवला के पेड़ की पूजा और दान करने लगे। इसके प्रभाव से उनके घर में भी पहले जैसी खुशहाली आ गई।


इस आंवला नवमी पूजा विधान

🌿 आंवला नवमी के दिन महिलाओं को सुबह स्नान करना चाहिए और अपने पास स्थित किसी भी आंवले के पेड़ के पास जाना चाहिए और उस स्थान पर सफाई करनी चाहिए।

🌿 इसके बाद आंवले के पेड़ के नीचे पूर्व दिशा में खड़े होकर जल और दूध चढ़ाएं।

🌿 इसके बाद पूजा आदि करने के बाद पेड़ के चारों ओर रुई लपेटें और परिक्रमा करें।

🌿 अंत में, आंवले की आरती उतारें और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।


*आंवला नवमी  मुहूर्त समय अक्टूबर 2025*

नवमी प्रारम्भ- 30 अक्टूबर 2025 प्रातः 10:06 बजे

नवमी समाप्त - 31 अक्टूबर 2025 प्रातः 10:03 बजे

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